छत्तीसगढ़ में मराठा शासन भाग – 2 1


 

सूबा शासन – ( 1787 – 1818 )

व्यंकोजी भोंसले  —  (1787 – 1815)  

 

  • 1787 में बिम्बाजी भोंसले की मृत्यु के बाद इसने शासन किया

 

  • इसने छ.ग. में प्रत्यक्ष शासन नही किया, नागपुर में रहकर छ.ग. का शासन संचालन किया,

 

  • इसके परिणामस्वरूप नागपुर छ.ग. की राजनितिक गतिविधियों का केंद्र बन गया, जिससे रतनपुर का राजनैतिक वैभव धूमिल होने लगा था,

 

 

  • इसने सूबा शासन ( सुबेदारी पध्दति ) की शुरुवात की,
  • सूबा शासन प्रणाली मराठो की उपनिवेशवादी निति का अंग थी,
  • जिसे सूबा सर्कार की संज्ञा दी गई थी,
  • सूबेदार रतनपुर के मुख्यालय में रहकर शासन का संचालन करते थे,
  • सूबेदारों की नियुक्ति ना तो स्थाई थी, और न ही वंशानुगत थी,
  • सूबेदारों की नियुक्ति ठेकेदारी प्रथा के अनुसार होती थी,
  • यह पध्दति 1818 ई. तक छ.ग. के ब्रिटिश नियंत्रण में आने तक विधमान रही,
  • इस दौरान व्यांकोजी का तीन बार छ.ग. में आगमन हुआ था,

 

 

कुल 8 सूबेदार नियुक्त हुए,

 

 

महिपतराव दिनकर – (1787 – 90 )

  • छ.ग. के प्रथम सूबेदार नियुक्त हुए थे,
  • इसके समय में शासन की समस्त शक्तिया बिम्बाजी की विधवा “आनंदी बाई” के हाथो में केन्द्रित थी,
  • सत्ता का संघर्ष प्रारम्भ हो गया था ,

 

 

  • इसके शासन काल में ही यूरोपीय यात्री “ फारेस्टर” छ.ग. आये थे,
  • इस यात्री ने सूबा शासन पर प्रकाश डाला था,
  • फारेस्टर – 17/05/1790 ई. दिन सोमवार को रिअपुर पंहुचा था,

 

 

विट्ठलराव दिनकर (1790  – 96 ) –

 

  • छ.ग. के दुसरे सूबेदार थे,
  • इसका शासन काल बहुत महत्वपूर्ण मन जाता है,
  • इसने छ.ग. की राजस्व व्यवस्था में कुछ परिवर्तन किया था,

 

  • छ.ग. में परगना पध्दति के जन्म दाता है
  • परगना पध्दति ( 1790 – 1818 ई. ) तक चली है,
  • परगने का प्रमुख कमाविश्दार कहलाता था, इसके अतिरिक्त फड़नवीस, बड़कर आदि नये अधिकारी को नियुक्त किया गया,
  • ग्राम के गोंटिया का पद यथावत बना रहा,
  • इस व्यवस्था के अंतर्गत राजस्व को दो भागो में विभाजित किया गया था,
    1. भूमि कर ,
    2. अतिरिक्त कर ( यह कर बाद में लगा )

 

  • इसके समय में यूरोपीय यात्री मि. ब्लंट का 13 मई 1795 ई. को रतनपुर में आगमन हुआ था,

 

 

 

भवानी कालू –  ( 1796 – 97 )

तीसरे सूबेदार थे,

इन्होने बहुत कम समय के लिए सुबेदारी की थी,

 

 

केशव गोविन्द  ( 1797 – 1808 )  

  • सबसे लम्बे समय तक छ.ग. में सुबेदारी की थी,
  • चौथे सूबेदार थे,
  • इसके समय में यूरोपीय यात्री कोलब्रुक छ.ग. आया था,
  • इसके समय की महत्वपूर्ण घटना – छ.ग. के आसपास पिंडारियो की गतिविधियों का आरम्भ सरगुजा व छोटानागपुर के मध्य सीमा विवाद का उठना आदि,

 

 

बीकाजी गोपाल —  

 

  • पांचवे सूबेदार थे,
  • राजनितिक इतिहास में विशेष महत्त्व का काल रहा था,
  • इस काल में राजनितिक घटना बड़ी तीव्रता के साथ घटित हुई,
  • प्रमुख घटना है –
    • इसके समय में पिंडारियो का छ.ग. में उपद्रव हुआ था,
    • इसी के समय में व्यंकोजी भोंसले की मृत्यु और उनके स्थान पर अप्पाजी को छ.ग. का वायसराय बनाया गया,
    • रघुजी भोंसले (द्वितीय ) की मृत्यु हुई थी, और उसके बाद  अंग्रेजो और मराठो के बिच सहायक संधि हुई थी,
    • परसों जी की आकस्मिक मृत्यु, आदि ने नागपुर के साथ – साथ छ.ग. के राजनीति को बहुत तेजी सा प्रभावित किया,

 

 

 

वायसराय अप्पासाहब व अन्य सूबेदार –

  • व्यंकोजी के मृत्यु के बाद अप्पासाहब छ.ग. के वायसराय बन गये थे,
  • ये नितांत लोभी व स्वार्थी प्रवृत्ति के थे,
  • छ.ग. के सूबेदारों से अत्याधिक धान की मांग की थी, सूबेदारों की असमर्थता पर उसे पदच्युत कर देते थे,

 

 

सरकार हरि –

6 वा सूबेदार था,

 

इसका शासन काल अल्प समय के लिए था,

 

सीताराम टांटिया –

7 वा सूबेदार था,

इसका शासन काल भी अल्प समय के लिए था,

 

 

यादवराव दिवाकर – ( 1817 – 1818 )

 

यह अंतिम सूबेदार था,

 

नोट — इसके बाद 1818 में छ.ग. में ब्रिटिश शासन का प्रारम्भ हो गया,  और सूबा पध्दति समाप्त हो गई,

 

 

छ.ग. में मराठा शासन के प्रमुख कारण —

 

  1. रघुजी भोंसले की विस्तारवादी नीतियाँ
  2. सेनापति भास्कर पन्त की महत्वकांक्षाएं
  3. कलचुरी राजवंश का विभाजन
  4. दोषपूर्ण कलचुरी सैन्य प्रबंध
  5. मोहन सिंह का षड्यंत्र
  6. अयोग्य व् अक्षम अंतिम कलचुरी शासक

 

 

सूबा  प्रथा की कुछ कमियां –

 

  1. ठेकेदारी प्रथानुसार नियुक्ति
  2. प्रतिभा, कार्यकुशलता नही
  3. जनहित की उपेक्षा की गई
  4. शोसन का पर्याय था
  5. आय – व्यय के आंकड़ो की जाँच नही होती थी,

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