पृथ्वी की आंतरिक संरचना – 1


पृथ्वी की आंतरिक संरचना –

 

स्वेस का वर्गीकरण —  ये कहते है, की—

  • पृथ्वी के उपरी भाग को भू-पर्पटी कहते है, ये बेसाल्ट चटटानो के बने होते है, इसके दो भाग होते है, —
  • सियाल,
  • सीमा

 

सियाल —  भू पर्पटी का पहला पार्ट हलके पदार्थ से बने होते है, – ये सिलिकॉन + एल्युमिनियम के बने होते है, इन्हें सियाल या क्रस्ट कहते है,

सीमा —   इसमें सिलिकॉन  + मैग्नेशियम की मात्रा अधिक होती है, इसे मेंटल कहते है,

  • क्रोर —  ये Ni  +  Fe  से बने होते है,
  • क्रस्ट की गहराई – 50 की.मी.
  • मेंटल —  2900 की.मी.
  • क्रोर —  2900 – 6378  की. मी. है,
  • पृथ्वी का व्यास – 12756
  • ध्रुवी व्यास —    12714   है,

 

पृथ्वी में परिवर्तन करने वाले बल है –

  1. आंतरिक बल
  2. बाह्य बल

आंतरिक बल —  प्लेटो के हलचल से भूकंप, ज्वाला मुखी आदि आन्तरिक बल है,

 

बाह्य बल —  अपरदन  एवं   अपक्षय

 

अपरदन चक्र ( कटाव) —  डेविस के सिद्धांत के अनुसार –

अपरदन > परिवहन  > निर्क्षेपन

नदी, हिमानी, पवन,  भूमि गत जल के कार्य, सागरीय जल, समुद्री तरंग,

 

नदी –

इसकी तीन अवस्थाएं होती है,

युवावस्था —    यह अपरदन होता है,

प्रौढ़ अवस्था   — यह परिवहन

वृद्धा अवस्था   — यह निर्क्षेपन होता है,

 

युवावस्था नदी की अत्यधिक गति होने से यह अपर्दान का कार्य ज्यादा करता है, युवावस्था में निर्क्षेपन का कार्य नही करता है,

  • युवावस्था में अपरदन से यह V  की घाटी बनती है,
  • I की घटी को कैनियन गार्ज कहते है, गार्ज से ज्यादा गहरा कैनियन होता है,
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में कोलोरेडो नदी पर विश्व प्रसिद्ध कैनियन है,

 

प्रोढ़अवस्था इस समय इसकी गति सामान्य होती है, और यह अपरदन के साथ परिवहन एवं निर्क्षेपन भी कर देता है,

  • इस समय नदी पर्वत से उतरते वक्त अपने साथ बड़े-बड़े पत्थरो और कंकडो को मैदानी भाग में उतारते समय पर्वतो के निचे जमा कर देते है, जिसे भाबर कहते है,
  • हिमालय के निचे “भाबर” को पर्वत वदी प्रदेश कहते है,
  • भाबर के निचे तराई —  उ. भारत में भाबर के निचे दलदली भूमि का निर्माण करती है, जिसे तराई कहते है,
  • प्रोढ़अवस्था में नदी विसर्प बनता है, जो की अपरदन + निक्षेपण करता है,
  • यह गहराई तल को नही काटता, बल्कि पाशर्व यानी किनारे – किनारे  को काटता है,

 

  • नदी का पानी जहाँ हर वर्ष नही पंहुचपाता, उसे बांगर मिटटी कहते है,
  • नदी के किनारे वाले पार्ट को खादर कहते है, यह उपजाऊ एवं नई मिटटी होती है,

 

 

वृद्धावस्था – इस समय नदी की गति धीमी होती है, और यह निक्षेपण का कार्य करता है,

इस समय नदी डेल्टा बनाती है, डेल्टा का शीर्ष भाग नदी की ओर तथा आधार समुद्र की ओर होता है,

चापाकार  डेल्टा  — विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा, है, जिसे  की सुंदरवन में, गंगा + ब्रम्पुत्र नदी से मिलकर बनती है,

इसका क्षेत्रफल —   80,000 km है,

 

पक्षीपाद डेल्टा – यह डेल्टा मिसिसीपी बनती है, जो की सभी नदी का अपरदन कहलाता है,

 

 

 

 

हिमानी ( हिमनदी )

इसके अपरदन से “V” की घाटी  “U” आकार की बन जाती है,

हार्न यह हिमानी के अपरदन से बनता है,

फियोर्ड – समुद्र का तट जो हिमानी नदी के कारण कटा – फटा बन जाता है, उसे फियोद कहते है,

ड्रामलिन —  हिमानी के निक्षेपण से बनता है, इसे अन्डो की टोकरी या अंडो की टोकरी का धरातल कहते है,

इसके अतिरिक्त हिम नदी के अपरदन से – सर्क, टार्न, अरेट, नुनाटक, केम आदि बनता है,

 

 

 

 

पवन

पवन के अपरदन से – छत्रक, यारडंग ज्यूगेंन, इनसेलबर्ग, प्लेया, लैगून, बरखान, लोएस बनता है,

 

छत्रक – यह कठोर एवं मुलायम चट्टानें होती है, जिसमे मुलायम चट्टानें घिस जाती है, और कठोर बच जाती है, तो इससे  यारडंग ज्यूगेंन,  जाली दार  शिला बनता है,

पवन के निक्षेपण कार्य का प्रमुख उदा. उ.पूर्वी  चीन में लोयस का मैदान है, जो की काफी उपजाऊ मैदान है,

बरखान–  पवन के कार्य से बनता है, पवन के द्वारा मरुस्थली क्षेत्रो में जहाँ बहुत अधिक रेत होती है,  रेत के अर्द्धचंद्राकर टीले बनते है,

 

 

 

 

भूमि गत जल के कार्य,

  • यह सबसे ज्यादा चुना के चट्टान या चुने वाली मिटटी पर प्रभावित होता है,
  • युवाला– चुने के घोलिय करण से बने बड़े, बड़े गड्ढो को
  • युवाला कहा जाता है,
  • लैपिज — लगातार घोलिय करण से धरातल बहुत ज्यादा उबड़ – खाबड़ हो जाता है, जिसे लैपिज कहते है,

 

  • चुने के प्रदेश को कार्स्ट स्थल कहते है,
  • चुने के प्रदेश में पानी के अन्दर प्रवाहित होने से जमींन के अन्दर कन्दरा या गुफा का निर्माण होता है,
  • चुना युक्त पानी के रिसने से गुफा के शीर्ष भाग और निचे भाग में ठोस चुने की लम्बी आकृति बनती जाती है, जिसे ( ऊपर से निचे की ओर आती हुई आकृति को ) स्टेलेक्टाइट  व  ( निचे से ऊपर की ओर जाती हुई आकृति को )   स्टेलेग्माईट कहते है,
  • स्टेलेक्टाइट व स्टेलेग्माईट दोनों जुड़ने पर स्तम्भ कहलाता है, इसका उदा. है, — कुटूम्बसर का गुफा

 

 

 

 

 

सागरीय जल के निक्षेपण से –

  • पुलिन – यह सागरीय जल के निक्षेपण से बनता है,
    • उड़ीसा के तट पर पुलिन मिलता है,

 

  • सागरीय लहरों को सर्प कहते है,

 

  • सागरीय जल के निक्षेपण से निर्मित कुछ अन्य स्थालाकृति – सर्फ़, वेला चली, तंगरिका, हूक, लूप, टोम्बोलो, आदि

 

 

समुद्री तरंगो द्वारा निर्मित स्थलाकृति —  इसके अपरदन से मेहराव बनता है,

 

  • इससे बनने वाली कुछ अन्य स्थालाकृति – समुद्री भृगु, भुजिव्हा, लैगून झील,  रिया तट ( भारत का प.तट ), स्टैक, डाल्मेशियन

 

 

देशांतर रेखा –

  • इसकी कुल संख्या – 360 होती है,
  • अर्द्ध गोलाकार होते है,
  • भूमध्य रेखा में 2 देशांतर के बिच की दुरी 111.3 km होती है,
  • 1 देशांतर पार करने में 4 मिनट का समय लगता है,

 

  • पृथ्वी एक दिन या 24 घंटे में एक चक्कर लगाती है, अर्थात 360घुमती है, या 360देशांतर पार करती है,
  • चूँकि, 24  घंटे = 360 देशांतर
  • तो 1 घंटा = 360 / 24 = 15
  • अतः 1 घंटे में 15 देशांतर पार करती है,
  • अब चूँकि 15 देशांतर घुमती है 1 घंटे ( 60 मिनट ) में
  • तो 1 देशांतर = 60/15 = 4 मिनट में
  • अतः पृथ्वी को 1 देशांतर पार करने में 4 मिनट लगता है,
  • 0देशांतर रेखा को मध्यान समय रेखा कहते है,
  • 0देशांतर रेखा, यह ब्रिटेन के लंदन के ग्रीन विच वेधशाला से गुजरती है, इसे जामा कहते है,

 

पृथ्वी –

  • पृथ्वी की आयु 45 अरब वर्ष है,
  • इसका भूमध्य रेखीय व्यास – 12756 तथा
  • ध्रुवीय व्यास — 12714 है,
  • इन दोनों व्यासो में अंतर 12756 -12714  = 42 km. का है,

 

 

  • इसकी परिधि –
  • भूमध्यरेखीय परिधि  — 40075 km
  • ध्रुवीय परिधि —  40, 008  km है,

 

  • क्षेत्रफल – 51 करोड़ वर्ग km.

 

  • जलमंडल — 71% भाग में
  • स्थालमंडल — 29% भाग में है,
  • पृथ्वी की सूर्य से औसत दुरी — 95  या 15 करोड़ km. है,
  • पृथ्वी से चंद्रमा की दुरी  — 3 लाख 80 हजार km. है,
  • सम्पूर्ण पृथ्वी को 24 टाइम जोन में बांटा गया है,
  • चंद्रग्रहण हमेशा पूर्णिमा को होता है, —
  • एक वर्ष में अधिकतम दोनों ग्रहण, 7 ग्रहण हो सकता है,
  • चन्द्रग्रहण जब चंद्रमा और सूर्य के बिच पृथ्वी आ जाती है तो होता है,
  • सूर्य ग्रहण – हमेशा आमवस्या के दिन होता है,
  • सूर्य ग्रहण के समय सूर्य का जो हल्का भाग जो चमकदार दिखाई देता है, उसे “किरिर” या “मुकुट” या “डायमंड रिंग”  कहते है,

 

 

  • उपसौर – सूर्य और पृथ्वी के बिच की न्यूनतम दुरी को उपसौर कहते है, यह 3 जनवरी को होता है,

 

  • अपसौर – सूर्य और पृथ्वी के मध्य अधिकतम दुरी को कहते है, यह 4 जुलाई को होता है,

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