छ.ग. इतिहास भाग -7 काकतीय वंश –


काकतीय वंश

  • वारंगल के चालुक्य अन्नमदेव (काकतीय) ने बस्तर के छिंदकनाग वंश के शासक हरिशचंद्र देव को 1313 ई. में परास्त किया.

 

  • अन्नमदेव 1324 ई. में सत्तासीन हुआ, उसने दंतेवाड़ा में प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर  का निर्माण कराया
  • इनकी राजधानी मंधोता थी,

 

 

 

1948 ई. तक काकतीय वंश का शासन चलता रहा,

 

इस वंश के प्रमुख शासक –

 

अन्नमदेव

  • इस वंश के प्रमुख शासक थे, इनका समय (1324 – 1369 ई.) तक था,

 

  • इन्होने ने चंदेली राजकुमारी “सोन्कुंवार” से विवाह किया,

 

  • दंतेवाडा का दंतेश्वरी देवी के मंदिर का निर्माण ग्राम – तराला मा करवाया,

 

  • लोक गीतों में इन्हें “चालकी बंस” कहा जाता था,

 

  • इसने अपनी राजधानी, चक्रकोट ( बारसूर) से मंधोता में स्थापित की,

 

हमीर देव – शासन (1369 – 1410 ई.) था

ओड़िसा के इतिहास में भी इनका वर्णन है,

 

 

भैरव देव –  शासन (1410 – 1470 ई.)

  • इनकी पत्नी मेघावती आखेट विद्या में निपुण थी,

 

  • मेघावती की स्मृति में आज बी मेघी साड़ी बस्तर में प्रचलित है,

 

 

पुरुषोत्तम देव – (1468 – 1534 ई.)

  • इसने मंधोता से अपनी राजधानी स्थानांतरित कर बस्तर को राजधानी बनाया गया,
  • बस्तर का दशहरा, गोंचा पर्व, बस्तर की रथयात्रा का प्रारम्भ करवाया,
  • ओड़िसा के राजा ने इन्हें रथपति की उपाधि दी,

 

प्रतापराज देव – (1602 – 1625 ई.)

  • नरसिंह देव के बाद अत्यंत प्रातापी राजा थे,
  • इसी के समय में गोलकुंड के कुलिकुतुब शाह की सेना, बस्तर की सेना से पराजित हुई थी,

 

जगदीश राज देव – (1625 – 1639 ई.)

गोलकुंडा के अब्दुल्ला क़ुतुब शाह के द्वारा अनेक धर्मान्धतापूर्ण  असफल आक्रमण किया था,

 

वीरसिंह देव – (1654 – 1680 ई. )

इसने अपने शासन काल में राजपुर का दुर्ग बनवाया,

 

 

राजपाल देव – ( 1709 – 1721 ई. )

  • बस्तर के पुराणों में इनका नाम रक्षपाल देव लिखा हुआ है,
  • इन्होने प्रौढ़ प्रताप चक्रवाती की उपाधि धारण की
  • ये दंतेश्वरी देवी ( मनिकेश्वरी देवी) के उपासाक थे,

 

 

चंदेल मामा – ( 1721 – 1731 ई. )-

  • ये चंदेल वंश के थे, और राजकुमार के मामा थे,
  • इन्हें दलपत देव ने मारा था,

 

दलपत देव –( 1731 – 1734 ई.)

  1. इसके शासन काल में रतनपुर राज्य भोंसले के अधीन हो गया था,

 

  1. इसके काल में बस्तर में भोंसले वंश के सेनापति निलुपंत ने पहली बार आक्रमण किया, और वह आसफल रहा,

 

  1. इसने 1770 में अपनी राजधानी बस्तर से जगदलपुर स्थानांतरित कर ली,

 

  1. इसके शासन काल में ही बंजारों द्वारा वस्तु विनिमय (गुड़,नमक) का व्यापर आरम्भ हुआ,

 

 

अजमेर सिंह – (1774 – 1777 ई.) –

  1. बस्तर क्रांति का मसीहा अजमेर सिंह को माना जाता है,

 

  1. दरियादेव व अजमेर सिंह के मध्य युद्ध हुआ था जिसमे अजमेरसिंह की विजय हुई थी,

 

  1. इसके समय में कंपनी सरकार, के प्रमुख जानसन व जपर की सेना ने पूर्व से और भोंसले के अधीन नागपुर की सेना ने पश्चिम से आक्रमण किया, जिसमे अजमेर सिंह पराजित हो गया,

 

 

दरियादेव –-(1777 – 1800 ई.)

  • इसने अजमेर सिंह के खिलाफ षडयंत्र कर मराठो की सहायता की थी,

 

  • 6 अप्रल 1778 ई. में दरियादेव ने कोटपाड़ संधि की, जिसके परिणामस्वरूप बस्तर नागपुर की रियासत के अंतर्गत रतनपुर के अधीन आ गया,

 

  • इसने मराठो की अधीनता स्वीकार कर लिया था,और प्रतिवर्ष मराठो को 59000 तकोली देना स्वीकार किया,

 

  • इसी के समय में बस्तर छ.ग. का अंग बना,

 

  • 1795 ई. में भोपालपट्टनम का संघर्ष हुआ था,

 

  • कैप्टन ब्लंट पहले अंग्रेज यात्री थे जो 1795 ई. में इन्ही के काल में बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्रो की यात्रा की थी, ये बस्तर में प्रवेश नही कर पाए परन्तु कंकर की यात्रा की,

 

महिपाल देव – (1800 – 1842 ई.)

  • ये दरियादेव के बड़े पुत्र थे, इन्होने भोसले वंश को तकोली देने से मन कर दिया था,

 

  • जिसके कारण व्यान्कोजी भोंसले के सेनापति रामचंद्र बाघ के नेत्रित्व में बस्तर पर आक्रमण कर दिया,

 

  • महिपाल देव की हार के बाद 1830 ई. में सिहावा परगना मराठो को देना पड़ा,

 

  • महिपाल देव अंग्रेजो के अप्रत्यक्ष शासन काल में बस्तर का पहला शासक था,

 

  • इसी के समय में परलकोट का विद्रोह हुआ था,

 

 

भूपालदेव – (1842 – 1853 ई. )

  • इसके शासन काल में मेरिया विद्रोह और तारापुर का विद्रोह हुआ था,

 

  • दलगंजन सिंह इसका सौतेला भाई था, जिसे तारापुर परगना का जमींदार बनाया गया,

 

भैरमदेव  — ( 1853 – 1891 ई.)

 

  1. ये अंग्रेजो के अधीन पहला शासक था,
  2. इसके काल में 1856 ई. में छ.ग. संभाग का dipti कमिश्नर चार्ल्स  इलियट ( पहला यूरोपीय) बस्तर आया था,

 

 

रानी चोरिस – (1878 – 1886 ई. )

छ.ग. की पहली विद्रोहिणी महिला थी,

 

 

रूद्रप्रताप देव – ( 1891 – 1921 ई. )

  • इन्होने रायपुर के राजकुमार कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की थी,

 

  • इनकी माता प्रफुल्ल कुमारी देवी थी, इनका राज्यभिषेक 1908 ई. में हुआ,

 

  • इसने रुद्र्प्रताप देव पुस्तकालय की स्थापना करवाई,

 

  • सडको का निर्माण कराया, और जगदलपुर को चौराहों का शहर बनवाया,

 

  • यूरोपीय युद्ध में अंग्रेजो की सहायता करने के कारन इन्हें सेंत ऑफ़ जेरुसलम की उपाधि दी गई,
  • 1910 ई. में इसके शासन काल में भूमकाल का विद्रोह हुआ था,
  • इसके शासन काल में घैटीपोनी प्रथा प्रचलित थी, जो स्त्री विक्रय से सम्बंधित थी,

 

प्रफुल्ल कुमार देवी  – (1922 – 1936 ई.)

  • छ.ग. की पहली व एकमात्र शासिका थी,

 

  • इनके पति प्रफुल्लचंद भंजदेव था, जो की मयुरभंज के राजकुमार थे,

 

  • 1936 में इनकी मृत्यु लन्दन में हुई, ये अपेंडी साईंटिस नामक रोग से ग्रसित थी,

 

  • इनके पुत्र का नाम प्रविरचंद भंजदेव था,

 

 

  • प्रविरचंद भंज देव – ( 1936 – 1961 ई. )

 

  • ये अंतिम काकतीय शासक थे, जिनका 12 वर्ष की उम्र में राज्याभिषेक हुआ,

 

  • सबसे कम उम्र के प्रसिद्ध विधायक थे, 1966 ई. में गोलीकांड में इनकी मृत्यु हो गई,

 

  • 1948 में बस्तर रियासत का भारत संघ में विलय हो गया,

 

 

 

उपाधि और उपाधि धारण करने वालो के नाम –

 

              शासक का नाम               मिलने वाली उपाधि
          महाशिवगुप्त बालार्जुन                  परम् महेश्वर
         पृथ्वी देव प्रथम              सकलकोसलाधिपति
          राजपाल देव              प्रौढ़ प्रताप चक्रवाती
         रुद्रप्रतापदेव              सेंट ऑफ़ जेरुसलम

 

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