छ.ग. इतिहास भाग -7 कलचुरी वंश भाग -2


पृथ्वी देव प्रथम – (1065 – 1095 ई.)

  1. इसने सकल कोसलाधिपति की उपाधि धारण की,
  2. रतनपुर में विशाल तलाब को निर्मित करने का श्रेय पृथ्वी देव को है,
  3. तुम्मान में पृथ्वी देवेश्वर नामक मंदिर बनवाया था,

 

जाजल्य देव प्रथम – (1090 – 1120 ई.)

  1. इसने उड़ीसा के शासक को परस्त कर स्वयं को त्रिपुरी की अधीनता से स्वतंत्र घोषित किया,
  2. जाजल्यदेव ने जाज्वाल्य्पुर ( जांजगीर ) नगर की स्थापना की,
  3. इसने अपने नाम के सोने के सिक्के चलाये, इन सिक्को पर गजसार्दुल की उपाधि धारण की, और उसका अंकन करवाया,

 

रत्नदेव द्वितीय – (1120 – 1135 ई.)

  1. रत्नदेव द्वितीय के ताम्र पत्र अभिलेख, अकलतरा, खरौद, पारगांव, शिवरीनारायण, एवं सरखो से प्राप्त हुए है,
  2. इन्होने त्रिपुरी के राजा गयाकर्ण एवं गंगवाड़ी के राजा अनंतवर्मा को परास्त किया था,
  3. रत्नदेव द्वितीय + अनंतवर्मा का युद्ध शिवरीनारायण के पास हुआ था,
  4. इनके काल में कला को राजाश्रय प्राप्त हुआ

 

 

पृथ्वीदेव द्वितीय – (1135-1165 ई. )

  1. इसके सेनापति जगतपाल देव थे, जगतपाल देव ने राजिव लोचन मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था,
  2. जिसका उल्लेख राजिम के शिलालेख में मिलता है,
  3. पृथ्वीदेव द्वितीय ने चक्रकोट पर आक्रमणकार उसे नष्ट कर दिया था, जिससे अनंत वर्मा चोडगंग भयभीत होकर समुद्र तट भाग गया था,

 

 

 

जाज्वल्यदेव द्वितीय –(1165- 1168 ई.)

  1. इनका राज्यकाल अल्पकालीन था,
  2. इसके समय में शिवरीनारायण से प्राप्त अभिलेख से त्रिपुरी के कलचुरी शासक जयसिंह के आक्रमण का पता चलता है,
  3. दोनों राजघरानों में शिवरीनारायण के समीप भीषण संघर्ष हुआ,

 

जगदेव का शासन – ( 1168 – 1178 ई. )

  1. जाज्वल्यदेव की मृत्यु के बाद रतनपुर में शान्ति व सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए उनके बड़े भाई गद्दी पर बैठे,
  2. इन्होने 10 वर्षो तक रतनपुर में शासन किया

 

 

रत्नदेव तृतीय –(1178 – 1198 ई. )

  1. इनके काल में भीषण दुर्भिक्ष से अव्यवस्था फ़ैल गई थी, जिसकी जानकारी हमें खरौद के लखनेश्वर मंदिर की दिवार पर जड़े शिलालेख से मिलती है,
  2. इसे व्यवस्थित करने के लिए,रत्नदेव ने गंगाधर ब्राम्हण को अपना प्रधानमंत्री बनाया,
  3. गंगाधर ने खरौद के लखनेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था,
  4. गंगाधर ने अराजकता को कंट्रोल किया,

 

 

प्रताप मल्ल का शासन –

  1. इनके राज्यकाल के तीन अभिलेख, पेंड्राबांध, कोनारी,और पवनी में मिले है
  2. प्रतापमल्ल ने अल्पायु में राज- काज प्राप्त किया

इसके बाद 300 वर्षो तक के काल  का पता नही चलता है, इसलिए इसके बाद के काल को अन्धकार युग कहते है,

 

 

बाहरेंद्र या बाहरसाय  -(1480-1525 ई.)

  1. इसने अपनी राजधानी रतनपुर से कोसंगा( वर्तमान छुरी ), या कोशाईगढ़ या कोशगई को किया.
  2. इसके काल में मुसलमानों का आक्रमण हुआ था,

 

 

कल्याणसाय –(1544-81 ई.)

  1. ये अपनी जामाबंदी प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है,यह प्राणाली भू-राजस्व से सम्बंधित है,
  2. कल्याणसाय ने 8 साल अकबर के दरबार में कार्य किया था,
  3. इसके समय में छ.ग. 18-18 गढ़ों में बंट गया,

 

 

तखत सिंह  – 1689  तक

  1. इसने 17 वीं शताब्दी में तखतपुर नगर की स्थापना की,

 

 

राजसिंह –(1689 – 1712 ई.)

  1. ये औरंगजेब के समकालीन थे,
  2. इनके दरबारी कवी गोपाल मिश्र थे, जिनकी किताब खूब तमाशा है, इसमें छ.ग. भाषा का पहली बार प्रयोग किया गया था,
  3. इस किताब में औरंगजेब की नीतियों की कटु आलोचना की गई है,

 

 

सरदारसिंह – इसने लगभग 20 वर्षो तक राज किया,

 

रघुनाथ सिंह

  • सरदारसिंह का भाई था,

 

  • यह कल्छुरिवंश का अंतिम शासक था, जो की 60 साल में शासक बना,

 

  • इसके काल में मारठो का आक्रमण हुआ,

 

  • मराठा सेनापति भास्कर पन्त ने इसके समय में आक्रमण किया था,

 

  • भास्कर पन्त के आक्रमण के बाद छ.ग में कलचुरी वंश का अंत हो गया,

 

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