छ.ग. इतिहास भाग -10 रायपुर के कलचुरी वंश भाग -3


रायपुर के कलचुरी वंश (लहुरी शाखा)

इनका समय 14 वीं शताब्दी का माना जाता है,

 

रायपुर में इस शाखा का संस्थापक संभवतः केशवदेव को माना जाता है,

इस वंश के शासको का क्रम –

  1. लक्ष्मी देव
  2. सिंघन देव
  3. रामचंद्र देव

 

 

सिंघन देव – इसने 18 गढ़ों को जीता था,

 

रामचंद्र देव

इसने रायपुर सहर की स्थापना की, रायपुर का नामकरण इसने अपने पुत्र “ब्रम्हदेव राय ” के नाम पर रखा,

 

ब्रम्हदेव राय

  • इस वंश के शासक ब्रम्हदेव के रायपुर तथा खल्लारी से दो शिलालेख क्रमशः 1409 व 1369 वर्णित है मिला है,

 

  • इस शिलालेख के अनुसार इनकी प्रारम्भिक राजधानी खाल्ल्वाटिका ( खल्लारी) को माना जाता है,

 

  • बाद में ब्रम्हदेव राय ने 1409 में  अपनी राजधानी रायपुर को बनाया,

 

  • ब्राम्ह्देव ने रायपुर में दूधाधारी मठ का निर्माण करवाया,

 

 

  • ब्रम्हदेव के समय में, खल्लारी (खल्लवाटिका, महासमुंद ) शिलालेख में देवपाल नामक एक मोची के द्वारा नारायण मंदिर (खल्लारी देवी माँ का मंदिर ) निर्माण की जानकारी मिलती है,

 

इस वंश की कुछ मुख्य जानकारी –

  1. इनकी कुल देवी – गजलक्ष्मी थी,
  2. ये शिव के उपासक थे,
  3. इनका प्रमुख दीवान होता था,
  4. सम्पूर्ण राज्य प्राशासनिक सुविधा के लिए गढ़ में विभाजित था,
  5. गढ़ बारहों में विभाजित था जिसका प्रमुख – दाऊ होता था,
  6. बारहों गाँव में विभाजित था जिसका प्रमुख – गौटिया होता था,
  7. ग्राम – शासन की सबसे छोटी इकाई होती थी,
  8. 1 गढ़ में, 7 बारहों, 84 गाँव होते थे,

 

 

काल्चुरी शासन प्रबंध –

 

प्रशासनिक व्यावस्था – राज्य अनेक प्रशासनिक इकइयो राष्ट्र (संभाग), विषय (जिला), देश या जनपद (तहसील), मंडल (खण्ड) में विभक्त था,

 

मंडलाधिकारी – मांडलिक तथा उससे बड़ा महामंडलेश्वर कहलाता था,

 

गढ़ाधिपति को दीवान, तालुकाधिपति को दाऊ तथा ग्राम प्रमुख को गौटिया कहा जाता था,

 

मंत्री मंडल – इसमें यूवराज महामंत्री, महामात्य, महासंधीविग्राहक (विदेश मंत्री), माहापुरोहित ( राजगुरु), जमाबंदी का मंत्री ( राजस्व मंत्री), महाप्रतिहार, महासामंत और महाप्रमातृ आदि,

 

अधिकारी – महाध्यक्ष – सचिवालय का मुख्य अधिकारी – महासेनापति

दण्डपाशिक – पुलिस विभाग का प्रमुख, महाभंदारिक,महाकोटटपाल  ( दुर्ग या किले की रक्षा करने वाला) आदि विभाध्यक्ष थे,

 

 

स्थानीय प्रशासन – 

  • नगरो एवं गाँव में पांच सदस्यों वाली संस्था होती थी जिसे – पंचकुल कहा जाता था,
  • पंचकुल के सदस्य महत्तर एवं प्रमुख महत्तर कहलाते थे,
  • नगर के प्रमुख अधिकारी को पुरप्रधान, ग्राम प्रमुख को ग्राम कूट या ग्राम भौगिक,
  • कर वसूलने वाले को – शौल्किक,
  • जुरमाना दंद्पाशिक के द्वारा वसूला जाता था,

 

सामाजिक व्यावस्था –

  • नागरिको का जीवन उच्च कोटि का था,

 

  • समाज में वर्ण व्यावस्था स्थापित हो गई थी,

 

  • कलचुरी लेखो में ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य का उल्लेख है, किन्तु शुद्र का उल्लेख नही मिलता,

 

  • कलचुरी में कायस्थ जाती लेखक का कार्य कर्ता था,

 

  • सूत्रधार जाती – शिल्पकला में सिध्दस्त थे,

 

  • प्रथा – बहुपत्ति व सती प्रथा की प्रथाए प्रचलित थी,

 

 

शिक्षा एवं साहित्य भाषा –

  • ये साहित्य में समृद्ध थे,

 

  • बाबूरेवाराम द्वारा लिखित ग्रन्थ है – तवारीख ए हैहयवंशी राजा”
  • पं. शिवदत्त शास्त्री की “ रतनपुर आख्यान”  ( छ.ग. के जमींदारों का इतिहास, एवं रतनपुर के इतिहास के विषय में जानकारी मिलती है )

 

आर्थिक स्तिथि  – 

  • इनकी आर्थिक स्तिथि काफी समृद्ध थी,

 

  • सिक्को का प्रचालन व वास्तु विनिमय का कार्य था,

 

  • राज्य की आय का प्रामुख स्रोत “भूमि कर” था,

 

 

धार्मिक स्तिथि- 

  • ये धर्मनिरपेक्ष शासक थे, एवं शैव उपासक थे, किन्तु इन्होने वैष्णव, जैन, एवं बौद्ध धर्मो को भी संरक्षक प्रदान किया,

 

  • इनके राज्यकाल में वैष्णव मंदिर, जांजगीर का विष्णुमन्दिर, खाल्ल्वाटिका का नारायण मंदिर, रतनपुर में प्राप्त लक्ष्मी मंदिर की मूर्ति, शिवरीनारायण का विष्णु मंदिर आदि का निर्माण करवाया,

 

  • इसी काल में राजिम के समीप चम्परान्य में 1593 ई. में महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म हुआ था,

 

  • वल्लभाचार्य शुद्धाद्वैतवाद अथवा पुष्टिमार्ग के संस्थापक थे,

 

  • रामानंदी माथो की स्थापना हुई, इसके अंतर्गत कालान्तर में रायपुर में दूधाधारी मठ स्थापित हुई,

 

 

स्थापत्य एवं शिल्प –

  • कलचुरी शिल्प में द्वारो पर गजलक्ष्मी अथवा शिव की मूर्ति पायी जाती थी,

 

  • सिक्को पर लक्ष्मी देवी का चित्र अंकित होता था, ताम्र पत्र लेख का आरम्भ ॐ नमः शिवाय से होता था,

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