संज्ञा, कारक


कारक

 

संज्ञा अथवा सर्वनाम के जिस रूप के कारन वाक्य के अन्य शब्दों से उसके सम्बन्ध का बोध होता है,

 

अथवा

 

कारक का प्रयोग हम संज्ञा या सर्वनाम को किसी अन्य शब्द के साथ जोड़ने के लिए करते है,

 

 

  • जैसे – राम खाना खाता है, ( यह पर राम एक संज्ञा  जिसमे खाना वह अन्य शब्द है, जिसे पूरा करने के लिए  खाता एक कारक के रूप में है,  अगर हम  राम खाना  लिखेंगे तो यह वाक्य पूरा नहीं होगा, इसे पूरा करने के लिए हमें  कारक की आवश्यकता होगी जो की राम के द्वारा किये जाने वाले कार्य को दर्शायेगा,

 

 

  • इसे हम इसके कारक चिन्ह के द्वारा समझ सकते है –
  • कारक को समझने के लिए संज्ञा व सर्वनाम के साथ जो चिन्ह लगाये जाते है उसे विभक्ति कहते है,  विभक्ति (कारक चिन्ह ) को “परसर्ग” भी कहा जाता है

 

कारक चिन्ह –

 

कर्ता                                               ने

कर्म                                                को

करण                                              से के द्वारा (परसर्ग के साथ, के कारण)

सम्प्रदान                                         को,के लिए

अपादान                                         से (अलग होना )

सम्बन्ध                                           का,की,के,रा,रे,री

अधिकरण                                        में,पे, पर

संबोधन                                          हे अरे

 

 

कारक के भेद – कारक के आठ भेद है,-

 

कर्ता कारक –

वाह कारक जिसका प्रयोग काम करने वाले (कर्ता) के लिए प्रयोग होता है, कर्ता के लिए “ने” विभक्ति का प्रयोग होता है, बिना विभक्ति के भी कर्ता करक का प्रयोग होता है,

 

जैसे –

 

  1. राम ने गाना गाया, यहाँ पर “ने” विभक्ति के प्रयोग से कर्ता कारक की पहचान की जा सकती है,
  2. दीपा गाती है, ( यहाँ पर विभक्ति नही है परन्तु कर्ता के द्वारा काम हो रहा है, तो यह भी कर्ता कारक है,)

 

 

चूँकि दोनों वाक्य में राम और दीपा काम करने वाले है, इनके द्वारा कोई काम किया जा रहा है, अर्थात जब काम स्वयं कर्ता के द्वारा होता है, तो वह कारक कर्ता कारक होता है)

 

 

 

कर्म कारक _

वाह कारक जिसके लिए काम किया जाता है, या यूँ कहा जा सकता है की कर्ता जिसके लिए काम कर्ता है उसे हम कर्म कारक कहते है,

अथवा

 

वाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता है उसे कर्मकारक कहते है,

इसकी विभक्ति  “को” है  परन्तु इसमें कभी कभी “ से” विभक्ति का भी प्रयोग होता है

 

तो कभी कभी इसमें किसी भी विभक्ति का प्रयोग नही होता है,

 

इसे उदा. के द्वारा समझा जा सकता है,

 

  1. सखियों ने राधा को समझाया – ( इसमें “ने” और “को” दोनों विभक्ति है किन्तु इस वाक्य में कर्ता ने जिसके लिए काम किया है, उसमे प्रयोग विभक्ति से इस कारक की पहचान की जा सकती है )
  2. इस वाक्य में सखिया “ कर्ता” है जो की काम कर रही है
  3. “राधा” का प्रयोग कर्म के रूप में है, इसमें राधा को, समझाया जा रहा है
  4. समझाना “क्रिया” के रूप में प्रयुक्त है
  5. चूँकि सखियों द्वारा राधा को समझाया जा रहा है, अर्थात सखिया राधा के लिए काम कर रही है,  तो इस वाक्य में राधा ही कर्ता का कर्म है

 

बिना विभक्ति का उदा. –

 

तूने पत्र लिखा – इस वाक्य में तूने  अर्थात करने वाला “ कर्ता” है

पत्र  ( जिसके लिए कर्ता लिख रहा है,  अर्थात  पत्र “ कर्म” है

लिखा  ( जो कार्य हो रहा है  अर्थात लिखने का कार्य हो रहा है तो, यह “क्रिया”

 

 

करण कारक –  

  • वह कारक जिसके कारण कोई कार्य होता है, अर्थात वाक्य में जीस शब्द के द्वारा हमे क्रिया (कार्य) के सम्बन्ध का बोध होता है,
  • जैसे – मैंने पेन्सिल से चित्र बनाया, यहाँ पर मैंने (कर्ता) पेन्सिल से (कारण ) और चित्र बनाना ( क्रिया) है
  • इस वाक्य में कर्ता द्वारा चित्र बनाने का कार्य हो रहा है, परन्तु जिसके कारण चित्र बन रहा है, वह पेन्सिल है, अतः चित्र बनाने का कार्य पेन्सिल से पूरा किया जा रहा है,
  • मैंने (कर्ता) ने, पेन्सिल से (करण )से, चित्र बनाया ( काम किया “क्रिया”)

 

सम्प्रदान कारक

  • सम्प्रदान का अर्थ – देना, अर्थात किसी के द्वारा किसी को कुछ प्रदान करना ही सम्प्रदान है
  • सम्प्रदान – की विभक्ति “ को,के लिए” है , अर्थात जिसके लिए कुछ किया जाए, उसके लिए सम्प्रदान शब्द का प्रयोग करते है,
  • उदा. – प्रदीप नें बच्चो को मिठाई दी,
  • इस वाक्य में प्रदीप कर्ता ( देने वाला) ने बच्चो को ( लेने वाले “जिसको दिया जा रहा है”  ) सम्प्रदान कारक है,

 

अपादान कारक

  • वह कारक जिसके कारण किसी वस्तु  (संज्ञा या सर्वनाम )   के अलग होने का पता चलता है,   अपादान कारक कहलाता है,
  • अपादान की विभक्ति ( से, अलग होना )
  • जैसे – गोपाल कल मुंबई से दिल्ली लौटा है,
  • इस वाक्य में गोपाल द्वारा मुंबई छोड़ा गया, और दिल्ली आया,
  • इस वाक्य में गोपाल मुंबई से अलग होकर दिल्ली पंहुचा है, अतः यह कारक अपादान कारक है

 

  • दूसरा उदा. – गंगा नदी हिमालय से निकलती है,
  • इस वाक्य में गंगा नदी हिमालय से निकल रही है, निकलना का अर्थ- बाहर जाना , अलग होना है, अतः गंगा का हिमालय से निकलना, उससे अलग होना है,

 

 

सम्बन्ध कारक –

  • संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप के कारन किसी अन्य शब्द के साथ लगाव या सम्बन्ध का अहेसास होता है उसे सम्बन्ध कारक कहते है,
  • इसकी विभक्ति = का,के,की,रा,रे,री है,

 

  • जैसे –
  • यह घर ‘”मेरा”’ है , –  इस वाक्य में “मेरा” शब्द सम्बन्ध कारक के रूप में है, “मेरा”  शब्द घर से उस संज्ञा/ सर्वनाम का सम्बन्ध दर्शाता है,
  • अतः सम्बन्ध दरसाने वाला शब्द ही सम्बन्ध कारक है,

 

अधिकरण कारक

  • संज्ञा अथवा सर्वनाम के जिस रूप के कारण क्रिया के आधार ( स्थान,समय,या भाव) का बोध होता है,
  • अथवा
  • जिस शब्द से हमें कर्ता के द्वारा किये जाने वाले कार्य के “ समय “ का या उसके “ स्थान” का और जिस भावना  से कार्य किया जा रहा है उस भाव का पता चलता है तो वह कारक अधिकरण कारक कहलाता है,

 

  • जैसे – तोता पेड़ पर बैठा है , –  इस वाक्य में तोता बैठने का कार्य कर रहा है, और जिस स्थान पर वह यह कार्य कर रहा है वह पेड़ है, अतः “पेड़ पर” इस शब्द से उसके बैठने के स्थान का बोध होता है,
  • अतः इस वाक्य में पेड़ पर अधिकरण कारक है

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *