छ.ग. का इतिहास भाग -5, छ.ग. का स्थानीय राजवंश भाग -3- नागवंश


नागवंश –

छ.ग. में नागवंश की दो शाखाओ ने शासन किया था,

  1. बस्तर का छिंदक नागवंश –
  • इस समय बस्तर का प्राचीन नाम चक्रकूट या भ्रमरकूट था,

 

  • बस्तर में छिंदकनागवंशी का शासन था, इन्हें छिंदक या सिदवंशी भी कहते थे,

 

  • दक्षिण कोसल में कलचुरी राजवंश का शासन था, इसी समय बस्तर में छिंदक नागवंश का शासन था,

 

  • चक्रकोट में छिंदक नागवंशो ने 400 वर्षो तक शासन किया, ये दसवीं सदी के आरम्भ से सन् 1313 ई. तक शासन करते रहे,

 

  • चक्रकोट का प्रथम शासक नृपतिभूषण थे,इनका काल 1060 ई. था, ( इसका उल्लेख ऐरिकोट से प्राप्त शक संवत 445 ( 1023 ई. ) के शिलालेख में मिलता है,

 

  • इस वंश का दूसरा शिलालेख- बारसूर से प्राप्त हुआ है,

 

  • इस वंश की राजधानी – भोगवतिपुरी थी,

 

  • बस्तर को कुम्भावती भी कहते थे,

 

  • बस्तर के नागवंशी भोगवती पुरेश्वर की उपाधि धारण करते थे,

 

  • इस वंश का तीसरा शासक – मधुरान्तक देव था,

 

सोमेश्वर देव प्रथम

  • ये सभी शासको में सबसे योग्य शासक थे, इसने अपने पराक्रम के बल पर एक विशाल राज्य की स्थापना का प्रयास किया,

 

  • सोमेश्वर प्रथम – का संघर्ष रतनपुर के कलचुरी शासक जाजल्यदेव से हुआ था,

 

  • जाजल्यदेव ने सोमेश्वर को पराजित कर बंदी बना लिया था,

 

  • सोमेश्वर देव ने अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया था,

 

  • छिंदक नागवंशो का महत्वपूर्ण केंद्र बारसूर था,

 

  • इस काल में बारसूर में अनेक मंदिरों एवं तालाबो का निर्माण कराया गया, – मामा-भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर, चंद्रादित्येश्वर मंदिर, आदि इस काल की ही देन  है

 

 

कन्हर देव

  • सोमेश्वर की मृत्यु के बाद ये सिंहासान पर बैठे, इनका कार्यकाल 1111 ई. – 1122 ई. तक था,

 

  • कन्हार्देव के बाद – जयसिंह देव, नरसिंह देव, कन्हरदेव द्वितीय, शासक बने,

 

 

हरीशचंद्रदेव

  • इस वंश का अंतिम शासक था,

 

  • इसे वारंगल के चालुक्य अन्नमदेव ने परास्त किया था, और छिंदक नागवंश को समाप्त कर दिया,

 

 

कवर्धा के फणिनाग वंश – 

 

  • नागवंशियो की एक शाखा फणिनाग वंश ने 9 वीं – 15 वीं सदी तक कवर्धा में शासन किया था,

 

  • यह वंश कलचुरीवंश की प्रभुसत्ता स्वीकार करता था,

 

  • इस वंश का विवरण – चौरागांव के समीप स्थित भग्नावशेष मड़वा महल के शिलालेख एवं भोरमदेव मंदिर के अभिलेख से मिलता है,

 

  • मड़वा महल शिलालेख में फणिनाग वंश की उत्पत्ति से लेकर राजा राम चन्द्र तक के राजाओं की वन्शावली दी गई है,

 

  • फणिनाग वंश के संस्थापक – राजा अहिराज है,

 

  • इसके क्रमशः शासक है – राजल्ल, धरनीधर,महिलदेव,सर्ववादन, गोपालदेव,नालदेव, भुवनपाल , कीर्तिपाल, जयपाल, महिपाल, आदि है

 

गोपालदेव – इन्होने 11 वीं शताब्दी (1089 ई.)  में भोरमदेव का मंदिर स्थापित किया है,

 

रामचंद्र देव – 14 वीं शताब्दी ( 1349 ई.)  में मड़वा महल का निर्माण करवाया

इनका विवाह कलचुरी वंश की राजकुमारी अम्बिकादेवी से हुआ था,

 

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