छ.ग. का इतिहास भाग -3, छ.ग. के स्थानीय राजवंश


छ.ग. के स्थानीय राजवंश

 

राजर्षितुल्यकुल वंश ( सुर वंश ) –

  • इस वंश ने दक्षिण कोशल पर 5 वीं 6 वीं  शताब्दी तक शासन किया था,

 

  • इस वंश की राजधानी – आरंग थी

 

  • आरंग में भीमसेन द्वितीय के ताम्रपत्र प्राप्त हुए है जिसके अनुसार सुर शासको के छह शासको ने 5 वीं 6 वीं शाताब्दी में दक्षिण कोशल में राज किया था,

 

  • ये छह शासक थे – सुरा,  दायित प्रथम,  विभिषण, भीमसेन प्रथम, भीमसेन द्वितीय, दायित द्वितीय,

 

  • इन्हें सनद में ऐसे परिवार से बताया गया है जो राजर्षि तुल्य कुल वंश से कम नही थे, इनकी इस उपाधि की तुलना चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरी गुफा शिलालेख की राजाधिराज श्री उपाधि से की जाती है,

 

  • ताम्रपत्र से यह ज्ञात होता है की इस वंश ने गुप्त सम्वंत का प्रयोग किया था, अतः इन्होने गुप्त शासको की अधिसत्ता स्वीकार की थी,

 

 

नल वंश –

बस्तर में इस वंश का शासन 5 वीं – 12 वीं सदी तक था

नल वंश का प्रारम्भ नल नामक राजा से माना जाता है,

नल वंश का संस्थापक वरघराज को माना जाता है, इस वंश की राजधानी पुष्करी  ( भोपलपटनम  ) थी

 

 

भवदत्त वर्मा ——–

इस वंश के प्रसिद्ध शासक भवदत्त वर्मा थे, जिसने बस्तर और कौसल क्षेत्र में राज्य करते हुए अपने साम्राज्य का विस्तार किया,

भवदत्त वर्मा का ताम्रपत्र का नाम – रिद्धि पूर्व ताम्रपत्र  है,

 

 

विलासतुंग ——

विलासतुंग इस वंश के महत्वपूर्ण शासक थे,

शासक विलासतुंग ने राजिम के राजिव लोचन मंदिर को बनवाया था, जिसका वर्णन राजिम शिलालेख से मिलता है,

राजिव लोचन मंदिर भगवान् विष्णु का मंदिर है,

इनका शासन काल 8 वीं शताब्दी  का है

विलासतुंग, पांडू वंशीय महाशिवगुप्त बालार्जुन के समकालीन थे,

 

स्कन्द वर्मन –  

इस वंश का सबसे शाक्ति शाली शासक थे,

 

 

  • नल वंशी शासको ने बस्तर एवं दक्षिण कोसल में अधिकांश समय तक शासन किया था,
  • इनका मुख्य शासन बस्तर में था,
  • इस वंश के कुछ प्रमाण –
  • कोंडागांव तहसील के ग्राम एर्डेगा में नल राजाओं के सिक्के मिले है,
  • नल वंश के राजाओं के चार उत्कीर्ण लेख मिले है जिसमे से दो ओड़िसा में, एक अमरावती में, और एक रायपुर में मिला है
  • वाकाटक राजा पृथ्वीसेन द्वितीय ने नल राजा को परास्त कर नल वाडी नल पर कब्जा किया था,
  • नल वंश का शासन सोमवंशियो द्वारा पराजित होने पर समाप्त हो गया,

 

 

शरभपुरीय वंश –

शरभ राज —

  • इनका शासन काल ईसा के 6 वीं शताब्दी में था,

 

  • इनकी राजधानी शरभपुर के नाम पर ही इस वंश का नाम शरभ पूरी पड़ा,

 

  • इस वंश के संस्थापक शरभराज थे,

 

  • उत्तर कालीन गुप्त शासक भानुगुप्त के “एरण स्तंभलेख “ (गुप्त संवत 510 ई.) में शरभराज का उल्लेख मिलता है,

 

नरेन्द्र –

  • शरभराज का उत्तराधिकारी नरेंद्र था

 

  • नरेन्द्र के दो ताम्रपत्र लेख कुरूद व् पिपरुदुला में मिला है,

 

 

प्रसन्नमात्र –

  • इस वंश का तीसरा शासक था,
  • इसने सोने का पानी चढ़े पतले सिक्के व चंडी के सिक्के जिन पर गरुड़ शंख तथा चक्र के निशान अंकित है,

 

  • इसने अपने नाम का सिक्का चलाया,

 

  • इसने निडिला नदी के किनारे अपने नाम का प्रसन्नपुर नगर बसाया था,

 

  • वर्तमान में निडिला नदी का नाम लीलागर नदी है, और प्रसन्नपुर का नाम मल्हार है,

 

जयराज –

  • जयराज ने शासन किया किन्तु जल्द ही इनकी मृत्यु हो गई, इसके बाद इनके भाई दुर्गराज मानमात्र ने शासन किया,

 

 

प्रवरराज

  • दुर्गराज का उत्तराधिकारी था, जिसने शासन किया,

 

  • इसने अपनी नई राजधानी सिरपुर को बनाया,

 

सुदेवराज

  • प्रवरराज का उत्तराधिकारी था,

 

  • कौवाताल अभिलेख (महासमुद) में इसके सामंत इंद्रबल का वर्णन है,

 

  • इस शासक के ताम्रपत्र मिले है जो की रायपुर के संग्रहालय में विधमान है,

 

  • प्रवरराज – इसके लेख हमें ठाकुरदिया ( सारमगढ़ और मल्हार से  प्राप्त  हुए है )

 

महाप्रवरराज द्वितीय

 

  • इस वंश का अंतिम और अयोग्य शासक था,

 

  • इसके समय में पांडूवंश और सोमवंश ने आक्रमन किया था, और शरभ पुरिय वंश को समाप्त कर दिया था,

 

प्रवरराज को भांडक के सोमवंशीय शासक तीवरदेव ने हराया था, और इसी से इस वंश की समाप्ति हो गई,

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