Monthly Archives: September 2017


छ.ग. इतिहास भाग -10 रायपुर के कलचुरी वंश भाग -3

रायपुर के कलचुरी वंश (लहुरी शाखा) इनका समय 14 वीं शताब्दी का माना जाता है,   रायपुर में इस शाखा का संस्थापक संभवतः केशवदेव को माना जाता है, इस वंश के शासको का क्रम – लक्ष्मी देव सिंघन देव रामचंद्र देव     सिंघन देव – इसने 18 गढ़ों को […]


छ.ग. इतिहास भाग -7 कलचुरी वंश भाग -2

पृथ्वी देव प्रथम – (1065 – 1095 ई.) इसने सकल कोसलाधिपति की उपाधि धारण की, रतनपुर में विशाल तलाब को निर्मित करने का श्रेय पृथ्वी देव को है, तुम्मान में पृथ्वी देवेश्वर नामक मंदिर बनवाया था,   जाजल्य देव प्रथम – (1090 – 1120 ई.) इसने उड़ीसा के शासक को […]


छ.ग. इतिहास भाग -8 कलचुरी वंश भाग -1

  कलचुरी वंश – (990  – 1740 ई.) 6 वीं शताब्दी के आस- पास  मध्य भारत मा कलचुरियो का अभ्युदय हुआ, प्रारम्भ में कलचुरियो ने आरम्भ में महिष्मति (महेश्वर जिला, खरगौन, म.प्र.) को सत्ता का केंद्र बनाया. कालान्तर में कलचुरियो की शाखा जबलपुर के निकट त्रिपुरी नामक क्षेत्र में कोकल्ल […]


छ.ग. इतिहास भाग -7 काकतीय वंश –

काकतीय वंश – वारंगल के चालुक्य अन्नमदेव (काकतीय) ने बस्तर के छिंदकनाग वंश के शासक हरिशचंद्र देव को 1313 ई. में परास्त किया.   अन्नमदेव 1324 ई. में सत्तासीन हुआ, उसने दंतेवाड़ा में प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर  का निर्माण कराया इनकी राजधानी मंधोता थी,       1948 ई. तक काकतीय […]


छ.ग. इतिहास भाग -6 कांकेर का सोमवंशीय शासन

कांकेर क्षेत्र पर शासन करने वाला एक प्राचीन वंश सोमवंश था,   कांकेर और उसके आस – पास के स्थानों से प्राप्त अभिलेखों से इस वंश के बारे में जानकारी प्राप्त होती है,   ये अभिलेख शक् संवत 1242 का है,   सोमवंश का प्रथम राजा – सिंहराज था सिंहराज […]


संज्ञा, कारक

कारक   संज्ञा अथवा सर्वनाम के जिस रूप के कारन वाक्य के अन्य शब्दों से उसके सम्बन्ध का बोध होता है,   अथवा   कारक का प्रयोग हम संज्ञा या सर्वनाम को किसी अन्य शब्द के साथ जोड़ने के लिए करते है,     जैसे – राम खाना खाता है, […]


संज्ञा भाग – 1

संज्ञा के विकारक तीन  प्रकार के है —   लिंग –  वह शब्द जिससे किसी वस्तु के पुरुष या स्त्री होने का बोध होता  है   लिंग का अर्थ – चिन्ह अथवा निशान होता है, अतः जिस चिन्ह से किसी संज्ञा के स्त्री या पुरुष होने का पता चलता है , […]


संज्ञा

संज्ञा – ——- पद – वाक्य में प्रयुक्त होने वाला शब्द ही पद कहलाता है, और इन शब्दों का व्याकरणिक परिचय पद परिचय कहलाता है, पद दो प्रकार के होते है –   विकारी पद अविकारी पद   विकारी पद – वे पद होते है जिनके प्रयोग से वाक्यों में […]


छ.ग. का इतिहास भाग -5, छ.ग. का स्थानीय राजवंश भाग -3- नागवंश

नागवंश – छ.ग. में नागवंश की दो शाखाओ ने शासन किया था, बस्तर का छिंदक नागवंश – इस समय बस्तर का प्राचीन नाम चक्रकूट या भ्रमरकूट था,   बस्तर में छिंदकनागवंशी का शासन था, इन्हें छिंदक या सिदवंशी भी कहते थे,   दक्षिण कोसल में कलचुरी राजवंश का शासन था, […]


छ.ग. का इतिहास भाग -4, छ.ग. का स्थानीय राजवंश भाग -2

पांडूवंश –    इस वंश का प्रथम राजा उदयन था,   इसकी राजधानी सिरपुर थी,   तीवरदेव – तीवरदेव इस वंश का पराक्रमी शासक था, जिसने कोसल और उत्कल को जीतकर- सकल – कोसलाधिपति की उपाधि धारण की थी,   महान्नन – उर्फ़ ननंद देव द्वितीय, इसके ताम्रपत्र सक्की तहसील […]


छ.ग. का इतिहास भाग -3, छ.ग. के स्थानीय राजवंश

छ.ग. के स्थानीय राजवंश   राजर्षितुल्यकुल वंश ( सुर वंश ) – इस वंश ने दक्षिण कोशल पर 5 वीं 6 वीं  शताब्दी तक शासन किया था,   इस वंश की राजधानी – आरंग थी   आरंग में भीमसेन द्वितीय के ताम्रपत्र प्राप्त हुए है जिसके अनुसार सुर शासको के […]


छ.ग. इतिहास भाग-2

माहाजनपद काल-    यह 6वी शताब्दी का काल है,   व्हेनसांग की किताब सी.यु.की. के अनुसार गौतम बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के बाद छ.ग. की राजधानी श्रावस्ती में आये थे और तीन  माह निवासरत थे   गौतम बुद्ध के दक्षिण यात्रा की जानकारी हमें “औदान शतक नामक ग्रन्थ” से मिलता है […]


छ.ग. इतिहास भाग -1

छ.ग. का इतिहास     प्रागैतिहासिक काल –( पाषाण काल) प्रागैतिहिसिक काल वह काल है, जिसमें इतिहास जान्ने के कोई लिखित प्रमाण नही मिले है, इस काल का कोई लिखित प्रमाण नही मिला है किन्तु छ.ग.के अनेक क्षेत्रो से इस काल को जानने के कई प्रमाण मिले है, इस काल को […]


समास

समास समास – दो या दो से अधिक शब्द जो आपस में एक दुसरे से  परस्पर  सम्बन्ध रखते है, मिलकर एक नया शब्द  बनाते है-   समास छः प्रकार का होता है, – अव्ययी भाव समास — तत्पुरुष समास द्विगु समास द्वन्द समास बहुब्रिही समास कर्मधारय समास     अव्ययी […]